यह भाग उन शोधकर्ताओं के संक्षिप्त और स्पष्ट परिचय देता है जिनके विचार, अक्सर हमारी जानकारी के बिना, आज के भाषा-सीखने के तरीक़े को गढ़ते हैं: स्टीवन क्रैशन और बोधगम्य इनपुट की परिकल्पना, मेरिल स्वेन और आउटपुट की परिकल्पना, माइकल लॉन्ग और अर्थ-वार्ता वाली अंतःक्रिया, रॉड एलिस और रूप-केंद्रित शिक्षण, बिल वैनपैटन और इनपुट-प्रसंस्करण, बॉनी नॉर्टन और शिक्षार्थी की पहचान, क्लेयर क्राम्श और सांस्कृतिक आयाम, तथा ओफेलिया गार्सिया और अनुभाषण (translanguaging)।
हर परिचय सरल भाषा में बताता है कि उस व्यक्ति ने क्या प्रस्तावित किया और जब आप वास्तव में पढ़ने बैठते हैं तब वह क्यों आज भी मायने रखता है — जैसे, ‘बोधगम्य इनपुट’ का अर्थ ‘बहुत सुनना’ क्यों नहीं है, और भाषा को बोलना-लिखना उसे ग्रहण करने से अलग काम क्यों करता है।